Wednesday, December 29, 2021

ई-श्रम कार्ड बनवाइए | 2 लाख रुपये का मुफ्त बीमा पाइये | E-Shram Card - Muft 2 Lakh Ka Beema

ई-श्रम कार्ड बनवाइए | 2 लाख रुपये का मुफ्त बीमा पाइये | E-Shram Card - Muft 2 Lakh Ka Beema

अपने घर की कामवाली बाई / नौकर, आपकी दुक़ान और आसपास के दुकानों में काम करने वाले नौकर/सेल्सगर्ल/सेल्सबॉय, रिक्शा चालक आदि सभी को  2 लाख रुपये का मुफ्त बीमा है तथा 5 लाख तक का मुफ्त इलाज है।

ई-श्रम कार्ड बनवाइए | 2 लाख रुपये का मुफ्त बीमा पाइये | E-Shram Card - Muft 2 Lakh Ka Beema


कौन पात्र है ?

वे सभी व्यक्ति जिनकी उम्र 16 से 59 साल के बीच है !

कौन पात्र नहीं है ?

  1. जो इनकम टैक्स जमा करता है !
  2. जो CPS/NPS/EPFO/ESIC का सदस्य है !

कैसे करें आवेदन ?

  • पंजीयन आपके आसपास के किसी भी चॉइस सेंटर / लोक सेवा केंद्र (CSC/ में हो सकता है।
  • आप स्वयं भी अपने मोबाइल या लैपटॉप से आवेदन कर सकते हैं !
  • जिनका मोबाइल नंबर आधार से लिंक नहीं है उन्हें आवेदन के लिए अपने नजदीकी csc सेंटर पर जाकर आवेदन कराना पड़ेगा!

आवेदन लिंक


Apply Online For E-Shram Card


आवेदन के लिए आवश्यक दस्तावेज ?

  1. आधार नंबर 
  2. मोबाईल नंबर 
  3. बैंक का खाता

क्या फायदा होगा ?

  • 2 लाख रुपये का मुफ्त बीमा
  • श्रम विभाग की सभी योजनाओं का लाभ जैसे बच्चों को छात्रवृत्ति, मुफ्त सायकल , मुफ्त सिलाई मशीन, अपने  काम के लिए  मुफ्त उपकरण आदि
  • भविष्य में राशन कार्ड को इससे लिंक किया जायेगा जिससे देश के किसी भी राशन दुक़ान से राशन मिल जायेगा ! 
  • वास्तव में आपके आसपास दिखने वाले प्रत्येक कामगार का यह कार्ड बन सकता है।  

विभिन्न प्रकार के मजदूरों / कामगारों का उदाहरण,  जिनका ई-श्रम कार्ड बन सकता है  निम्नानुसार हैं : -

घर का नौकर - नौकरानी (काम वाली बाई), खाना बनाने वाली बाई (कुक), सफाई कर्मचारी, गार्ड,  रेजा, कुली, रिक्शा चालक, ठेला में किसी भी प्रकार का सामान बेचने वाला (वेंडर), चाट ठेला वाला, भेल वाला, चाय वाला, होटल के नौकर/वेटर, रिसेप्शनिस्ट, पूछताछ वाले क्लर्क, ऑपरेटर,   हर दुकान का नौकर / सेल्समैन / हेल्पर, ऑटो चालक, ड्राइवर, पंचर बनाने वाला,  ब्यूटी पार्लर की वर्कर, नाई, मोची, दर्ज़ी ,बढ़ई , प्लम्बर, बिजली वाला (इलेक्ट्रीशियन), पोताई वाला (पेंटर), टाइल्स वाला, वेल्डिंग वाला, खेती वाले मज़दूर, नरेगा मज़दूर, ईंट भट्ठा के मज़दूर, पत्थर तोड़ने वाले, खदान मज़दूर, फाल्स सीलिंग वाला, मूर्ती बनाने वाले, मछुवारा, चरवाहा, डेयरी वाले, सभी पशुपालक, पेपर का हॉकर,  जोमैटो स्विगी के डिलीवरी बॉय, अमेज़न फ्लिपकार्ट के डिलीवरी बॉय  (कूरियर वाले), नर्स, वार्डबॉय, आया,  मंदिर के पुजारी,  विभिन्न सरकारी ऑफिस के दैनिक वेतन भोगी, कलेक्टर  रेट वाले कर्मचारी, आंगनवाड़ी कार्यकर्त्ता सहायिका, मितानिन, आशा वर्कर  आदि आदि अर्थात  सभी तरह के व्यक्ति का पंजीयन हो सकता है।

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Sunday, December 26, 2021

बड़े फायदे का है ई-श्रम कार्ड, जानिये क्या-क्या मिलते हैं फायदे? | e-SHRAM CARD

बड़े फायदे का है ई-श्रम कार्ड, जानिये क्या-क्या मिलते हैं फायदे?

इस कार्ड की मदद से असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को सरकारी योजनाओं , देश के दूसरे हिस्सों में रोजगार के अवसर और दुर्घटना होने पर आर्थिक सुरक्षा का लाभ मिलता है !

बड़े फायदे का है ई-श्रम कार्ड, जानिये क्या-क्या मिलते हैं फायदे? | e-SHRAM CARD


असंगठित श्रेत्र के श्रमिकों को आर्थिक सुरक्षा देने और उन्हें संगठित श्रेत्र के श्रमिकों के बराबर फायदे दिलाने के लिये सरकार ने इसी साल अगस्त में ई-श्रम पोर्टल की शुरुआत की थी. सरकार का मकसद इस पोर्टल के जरिये देश में मौजूद असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की जानकारी जुटाना और उन तक सभी सरकारी योजनाओं का फायदा पहुंचाना है. इसके लिये श्रमिकों को ई-श्रम कार्ड दिया जा रहा है. जिसे दिखा कर श्रमिक आसानी से सरकारी योजनाओं से लेकर रोजगार के अवसरों तक पहुंच प्राप्त कर सकते हैं!

क्या है ई-श्रम कार्ड

ई-श्रम कार्ड सरकार के द्वारा श्रमिकों को जारी किया जाने वाला एक खास कार्ड है जिसके साबित होता है कि श्रमिक असंगठित क्षेत्र का एक कामगार है और जिसके सभी दस्तावेज ई-श्रम पोर्टल पर वेरिफाई किये जा चुके हैं. यानि अब श्रमिकों को अपने फायदे पाने के लिये ज्यादा दौड़भाग नहीं करनी होगी. वो इस दिखाकर या सबमिट कर असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को मिलने वाले सभी फायदे पा सकते हैं!

क्या है ई-श्रम कार्ड के फायदे

  • ई-श्रम कार्ड हासिल करने वाले मजदूरों को देश में कहीं भी रोजगार पाना आसान हो जायेगा. डाटा बेस में उनसे जुड़े आंकड़े होने की वजह से उन्हें काम पाने में प्राथमिकता मिल सकेगी!
  • ई-श्रम पोर्टल पर रजिस्टर्ड श्रमिक को 2 लाख रुपये का दुर्घटना बीमा कवर दिया जाएगा. पोर्टल पर रजिस्टर्ड श्रमिक यदि दुर्घटना का शिकार होता है तो मृत्यु या फिर पूर्ण विकलांगता की स्थिति में 2 लाख रुपये की धनराशि दी जाएगी. वहीं, अगर श्रमिक आंशिक रूप से विकलांग होता है तो इस बीमा योजना के तहत वह एक लाख रुपये का हकदार होगा!
  • इस कार्ड की मदद से असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को प्रधानमंत्री श्रम योगी मान धन योजना, स्वरोजगार करने वालों के लिये राष्ट्रीय पेंशन योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, अटल पेंशन योजना, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, प्रधानमंत्री आवास योजना, राष्ट्रीय सामाजिक सहायता योजना, आयुष्मान भारत, बुनकरों के लिये स्वास्थ्य योजना, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, प्रधानमंत्री रोजगार सृजन योजना जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ मिलेगा!

क्या है रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया और शर्तें

इस कार्ड के लिए 16 से 59 साल का कोई भी शख्स जो असंगठित क्षेत्र में काम करता है रजिस्ट्रेशन करवा सकता है. रजिस्ट्रेशन ई-श्रम पोर्टल https://eshram.gov.in/ के जरिए कामगार या तो खुद कर सकता है या फिर कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) पर जाकर करा सकता है. रजिस्ट्रेशन पूरी तरह से नि:शुल्क है! कामगारों को पोर्टल या कॉमन सर्विस सेंटर पर रजिस्ट्रेशन के लिए कोई भुगतान नहीं करना पड़ेगा!

किन दस्तावेजों की पड़ेगी जरूरत

पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन के लिए वर्कर्स को नाम, पेशा, पता, शैक्षणिक योग्यता, स्किल जैसी जानकारियां दर्ज करनी होंगी. रजिस्ट्रेशन के लिए आधार नंबर डालते ही वहां के डाटा बेस से कामगार की सभी जानकारियां अपने आप पोर्टल पर सामने दिख जाएंगी. व्यक्ति को बाकी की जरूरी जानकारियां भरनी होंगी!

कामगार द्वारा ई-श्रम पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करने के लिए आधार संख्या, आधार से लिंक मोबाइल नंबर. बैंक खाता जरूरी है ! यदि किसी कामगार के पास आधार से लिंक मोबाइल नंबर नहीं है, तो वह निकटतम सीएससी पर जा सकता है और बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के माध्यम से रजिस्ट्रेशन कर सकता है!

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Friday, December 10, 2021

एकलिंग जी मंदिर - उदयपुर राजस्थान | Ekling Ji Temple Udaipur, Rajasthan

एकलिंग जी मंदिर -  उदयपुर राजस्थान | Ekling Ji Temple Udaipur, Rajasthan

इस मंदिर में विभिन्न देवताओं के मंदिर का निर्माण विभिन्न लोगों द्वारा किया गया है। मंदिर के प्रांगण में गिरधर गोपाल जी का मंदिर भी स्थित है इसका निर्माण महाराणा कुंभा ने करवाया था ऐसा माना जाता कि श्री कृष्ण की अनन्य भक्त मीराबाई मंदिर में प्रभु की भक्ति आराधना में लीन रहती थी। इसीलिए इस मंदिर को मीरा बाई मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

एकलिंग जी मंदिर -  उदयपुर राजस्थान | Ekling Ji Temple Udaipur, Rajasthan


मंदिर में दो सुंदर तालाब भी है- पार्वती कुंड और तुलसी कुंड। मंदिर के पश्चिम दिशा की ओर मेवाड़ के गुरुओं की समाधि भी दर्शनीय है। शिवलिंग भगवान शिव का ही रूप है जिस पर चांदी का सांप लोगों को मुख्य आकर्षण के तौर पर नजर आता है।

एकलिंग जी महादेव का इतिहास-

 इतिहास बताता है कि एकलिंग जी को ही साक्षी मानकर मेवाड़ के राणाओ ने अनेक बार यहां ऐतिहासिक महत्व के प्रण लिए थे। एकलिंग जी का यह भव्य मंदिर चारों ओर से ऊंचे परकोटे से घिरा हुआ है। इस परिसर में कुल 107 मंदिर है मुख्य मंदिर में एकलिंग जी की चार सिरो वाली भव्य मूर्ति स्थापित है। 

चार मुख की महादेव भगवान शिव की प्रतिमा चारों दिशाओं में देखती हैं इसमें विष्णु उत्तर में, सूर्य पूर्व में, और ब्रह्मा पश्चिम का प्रतिनिधित्व करते हैं। शिव के वाहन नंदी बैल की एक पीतल की प्रतिमा मंदिर के मुख्य द्वार पर स्थापित है। मंदिर में परिवार के साथ भगवान शिव का चित्र देखते ही बनता है। यमुना और सरस्वती की मूर्तियां भी मंदिर में उपस्थित है।

इन छवियों के बीच में यहां एक शिवलिंग चांदी के सांप से घिरा हुआ है। मंदिर के चांदी के दरवाजों पर भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय की छवियां है। नृत्य करती नारियों की मूर्तियां भी देखने योग्य है। गणेश जी का मंदिर, अंबा माता का मंदिर और कालिका मंदिर इस मंदिर के पास ही स्थित है। 

भगवान श्री एकलिंग जी मन्दिर का निर्माण बप्पा रावल ने आठवीं शताब्दी के लगभग कराया था। उसके बाद यह मंदिर तोड़ दिया गया जिसे बाद में उदयपुर के महाराणा मोकल ने इसका जीर्णोद्धार करवाया और वर्तमान मंदिर के नए स्वरूप का संपूर्ण श्रेय महाराणा रायमल को है एकलिंग जी मंदिर की काले संगमरमर से निर्मित महादेव की चतुर्मुखी प्रतिमा की स्थापना महाराणा रायमल के द्वारा कि गई थी।

श्री एकलिंग जी मंदिर से 4 किलोमीटर दूर सहस्रबाहु मंदिर प्रसिद्ध है। यह मंदिर खंडित रूप में है। यह मंदिर ओरंगजेब आक्रमण के समय ध्वस्त हो गया। जिस कारण से इस मंदिर में बनी देवी देवताओं की मूर्तियां टूटे हुए रूप में दिखती है। यह मंदिर वर्तमान में सांस बहू मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। नागदा में स्थित यह मंदिर सोलंकी ( महागुरजर शैली ) कला का प्रतीक है। 

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भारत एक रहस्यमय देश है, आईये जानते हैं इसकी महानता के कारण | India is a Mysterious Country

भारत एक रहस्यमय देश है, आईये जानते हैं इसकी महानता के कारण | India is a Mysterious Country


1. प्रकृति: 

एक ओर समुद्र तो दूसरी ओर बर्फीले हिमालय है, एक ओर रेगिस्तान तो दूसरी ओर घने जंगल है एक ओर ऊंचे-ऊंचे पहाड़ तो दूसरी ओर मैदानी इलाके है। प्रकृति के ऐसे सारे रंग किसी अन्य देश में नहीं है। भारतीय मौसम दुनिया के सभी देशों के मौसम से बेहतर है। सिर्फ यहीं पर प्रमुख रूप से चार ऋतुएं होती है। विदेशी यहां आकर भारत के वातावरण से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

भारत एक रहस्यमय देश है, आईये जानते हैं इसकी महानता के कारण | India is a Mysterious Country


2. ऋषि_मुनि: 

सप्त ऋषियों के अलावा, कपिल, कणाद, गौतम, जैमिनि, व्यास, पतंजलि, बृहस्पति, अष्टावक्र, शंकराचार्य, गोरखनाथ, मत्स्येंद्र नाथ, जालंधर, गोगादेव, झुलेलाल, तेजाजी महाराज, संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर, रामानंद, कबीर, पीपा, रामसापीर बाबा रामदेव, पाबूजी, मेहाजी मांगलिया, हड़बू, रैदास, मीराबाई, गुरुनानक, धन्ना, तुलसीदास, दादू दयाल, मलूकदास, पलटू, चरणदास, सहजोबाई, दयाबाई, एकनाथ, तुकाराम, समर्थ रामदास, भीखा, वल्लभाचार्य, चैतन्य महाप्रभु, विट्ठलनाथ, संत सिंगाजी, हितहरिवंश, गुरु गोविंदसिंह, हरिदास, दूलनदास, महामति प्राणनाथ, शैगांव के गजानन महाराज, रामकृष्‍ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, मेहर बाबा, दादा धूनी वाले, लाहड़ी महाशय, शीलनाथ बाबा, महर्षि अरविन्द, जे कृष्णमूर्ति, ओशो, स्वामी प्रभुपाद, दयानंद सरस्वती, महर्षि महेश योगी, एनी बिसेंट, आनंद मूर्ति, दादा लेखराज, श्री शिव दयाल सिंह, श्रीराम शर्मा आचार्य, देवहरा बाबा, नीम करौली बाबा आदि ऐसे हजारों साधु और संत हैं।

3. 'प्रथम_मानव': 

यूं तो मनुष्य विकास क्रम से मनुष्य बना, लेकिन कहते हैं कि मनुष्य प्रारंभ में भारत में ही रहता था। शोधानुसार सप्तचरुतीर्थ के पास वितस्ता नदी की शाखा देविका नदी के तट पर मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई। प्रथम सृष्टिकर्ता मानव को स्वायंभु मनु कहा गया।

4. 'प्रथम_धर्म' : 

ऋग्वेद को संसार का प्रथम धर्मग्रंथ माना जाता है। ऋग्वेद को भारतीयों ने ही सरस्वती नदी के तट पर बैठकर लिखा गया। चार ऋषियों अग्नि, वायु, अंगिरा और आदित्य ने मिलकर ऋग्वेद के ज्ञान को वाचिक परंपरा में ढाला जो अभी तक जारी है। वेदों पर आधारित धर्म को ही सनातन वैदिक या हिन्दू धर्म कहा जाता है।

5. मोक्ष_का_दर्शन : 

योग, तप, षड् दर्शन और ध्यान ही धर्म और मोक्ष का मार्ग है। प्राचीन काल से ही साधु-संतों ने इसे प्रचारित किया।

ऋषि पतंजलि ने इसे 'आष्टांग योग' नाम से सुव्यवस्थित किया। आष्टांग योग के बाहर धर्म, दर्शन और अध्यात्म की कल्पना नहीं की जा सकती।

6. मंदिर_और_गुफाएं : 

भारत में कई प्राचीन रहस्यमी मंदिर, स्तंभ, महल और गुफाएं हैं। बामियान, बाघ, अजंता-एलोरा, एलीफेंटा और भीमबेटका की गुफाएं। 

12 ज्योतिर्लिंग, 51 शक्तिपीठ के अलावा कई चमत्कारिक मंदिर।

7. रहस्यमयी_विद्याएं : 

प्राणविद्या, त्राटक, सम्मोहन, जादू, टोना, स्तंभन, इन्द्रजाल, तंत्र, मंत्र, यंत्र, चौकी बांधना, गार गिराना, सूक्ष्म शरीर से बाहर निकलना, पूर्वजन्म का ज्ञान होना, अंतर्ध्यान होना, त्रिकालदर्शी बनना, मृत संजीवनी विद्या, ज्योतिष, सामुद्रिक शास्त्र, वास्तु शास्त्र, हस्तरेखा, पानी बताना, धनुर्विद्या, अष्टसिद्धियां, नवनिधियां आदि सैंकड़ों विद्याओं का जन्म भारत में हुआ।

8. किताबें :

वेद , पुराण , गीता , उपनिषद की कथाएं, पंचतंत्र, बेताल या वेताल पच्चीसी, जातक कथाएं, सिंहासन बत्तीसी, हितोपदेश, कथासरित्सागर, तेनालीराम की कहानियां, शुकसप्तति, कामसूत्र, कामशास्त्र, रावण संहिता, भृगु संहिता, लाल किताब, संस्कृत सुभाषित, विमान शास्त्र, योग सूत्र, परमाणु शास्त्र, शुल्ब सूत्र, श्रौतसूत्र, अगस्त्य संहिता, सिद्धांतशिरोमणि, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, च्यवन संहिता, शरीर शास्त्र, गर्भशास्त्र, रक्ताभिसरण शास्त्र, औषधि शास्त्र, रस रत्नाकर, रसेन्द्र मंगल, कक्षपुटतंत्र, आरोग्य मंजरी, योग सार, योगाष्टक, अष्टाध्यायी, त्रिपिटक, आगम एवं जिन सूत्र, समयसार, लीलावती, करण कुतूहल, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, आदि लाखों ऐसी किताबें , ग्रंथ हैं जिनके दम पर आज विज्ञान, तकनीक आदि सभी क्षेत्रों में प्रगति हो रही है।

9. कला : 

कलारिपट्टू (मार्शल आर्ट), भाषा, लेखन, नाट्य, गीत, संगीत, नौटंकी, तमाशा, स्थापत्यकला, चित्रकला, मूर्तिकला, पाक कला, साहित्य, बेल-बूटे बनाना, नृत्य, कपड़े और गहने बनाना, सुगंधित वस्तुएं-इत्र, तेल बनाना, नगर निर्माण, सूई का काम, बढ़ई की कारीगरी, पीने और खाने के पदार्थ बनाना, पाक कला, सोने, चांदी, हीरे-पन्ने आदि रत्नों की परीक्षा करना, तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना आदि कलाओं का जन्म भारत में हुआ।

10.खेल :

शतरंज, फुटबॉल, कबड्डी, सांप-सीढी का खेल, ताश का खेल, तलवारबाजी, घुड़सवारी, धनुर्विद्या, युद्ध कला, खो-खो, चौपड़ पासा,रथ दौड़, नौका दौड़, मल्ल-युद्ध, कुश्ती, तैराकी, भाला फेंक, आखेट, छिपाछई, पिद्दू, चर-भर, शेर-बकरी, चक-चक चालनी, समुद्र पहाड़, दड़ी दोटा, गिल्ली-डंडा, किकली (रस्सीकूद), मुर्ग युद्ध, बटेर युद्ध, अंग-भंग-चौक-चंग, गोल-गोलधानी, सितौलिया, अंटी-कंचे,पकड़मपाटी, पोलो या सगोल कंगजेट, तीरंदाजी, हॉकी, गंजिफा, आदि खेलों का जन्म भारत में हुआ !

11.अविष्कार : 

पहिया, बटन, रूलर स्केल, शैम्पू, विमान, नौका, जहाज, व्यंजन, रथ, बैलगाड़ी, भाषा, व्याकरण, शून्य और दशमलव, शल्य चिकित्सा,हीरे का खनन, खेती करना, रेडियो, बिनारी कोड, स्याही, धातुओं की खोज, प्लास्टिक सर्जरी, अस्त्र-शश्त्र, बिजली, ज्यामिती, गुरुत्वाकर्षन का नियम, आयुर्वेद चिकित्सा, पृथ्वी का सूर्य का चक्कर लगाना, ब्रह्मांड की लंबाई चौड़ाई नापना, कैलेंडर, पंचाग, परमाणु सिद्धांत, वाद्य यंत्र, पाई के मूल्य की गणना, लोकतंत्र, साम्यवाद आदि का अविष्कार भारत में हुआ !!

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मेवाड़ का वीर योद्धा - महाराणा प्रताप Maharana Pratap, The Brave Warrior of Mewar

मेवाड़ का वीर योद्धा - महाराणा प्रताप

Maharana Pratap, The Brave Warrior of Mewar

भारतीय इतिहास में राजपुताने का गौरवपूर्ण स्थान रहा है।

यहां के रणबांकुरों ने देश, जाति, धर्म तथा स्वाधीनता की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने में कभी संकोच नहीं किया। उनके इस त्याग पर संपूर्ण भारत को गर्व रहा है। वीरों की इस भूमि में राजपूतों के छोटे-बड़े अनेक राज्य रहे जिन्होंने भारत की स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया। इन्हीं राज्यों में मेवाड़ का अपना एक विशिष्ट स्थान है जिसमें इतिहास के गौरव बप्पा रावल, खुमाण प्रथम महाराणा हम्मीर, महाराणा कुम्भा, महाराणा सांगा, उदयसिंह और वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप ने जन्म लिया है।

मेवाड़ का वीर योद्धा - महाराणा प्रताप Maharana Pratap, The Brave Warrior of Mewar


 सवाल यह उठता है कि महानता की परिभाषा क्या है। 

अकबर हजारों लोगों की हत्या करके महान कहलाता है और महाराणा प्रताप हजारों लोगों की जान बचाकर भी महान नहीं कहलाते हैं। 

दरअसल, हमारे देश का इतिहास अंग्रेजों और कम्युनिस्टों ने लिखा है। उन्होंने उन-उन लोगों को महान बनाया जिन्होंने भारत पर अत्याचार किया या जिन्होंने भारत पर आक्रमण करके उसे लूटा, भारत का धर्मांतरण किया और उसका मान-मर्दन कर भारतीय गौरव को नष्ट किया।

मेवाड़ के महान राजपूत नरेश महाराणा प्रताप अपने पराक्रम और शौर्य के लिए पूरी दुनिया में मिसाल के तौर पर जाने जाते हैं। एक ऐसा राजपूत सम्राट जिसने जंगलों में रहना पसंद किया लेकिन कभी विदेशी मुगलों की दासता स्वीकार नहीं की। उन्होंने देश, धर्म और स्वाधीनता के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया।

कितने लोग हैं जिन्हें अकबर की सच्चाई मालूम है और कितने लोग हैं जिन्होंने महाराणा प्रताप के त्याग और संघर्ष को जाना? प्रताप के काल में दिल्ली में तुर्क सम्राट अकबर का शासन था, जो भारत के सभी राजा-महाराजाओं को अपने अधीन कर मुगल साम्राज्य की स्थापना कर इस्लामिक परचम को पूरे हिन्दुस्तान में फहराना चाहता था। इसके लिए उसने नीति और अनीति दोनों का ही सहारा लिया। 30 वर्षों के लगातार प्रयास के बावजूद अकबर महाराणा प्रताप को बंदी न बना सका।

जन्म :

महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 ईस्वी को राजस्थान के कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। लेकिन उनकी जयंती हिन्दी तिथि के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया को मनाई जाती है। उनके पिता महाराजा उदयसिंह और माता राणी जीवत कंवर थीं। वे राणा सांगा के पौत्र थे। महाराणा प्रताप को बचपन में सभी 'कीका' नाम लेकर पुकारा करते थे। महाराणा प्रताप की जयंती विक्रमी संवत कैलेंडर के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है।

राज्याभिषेक :

महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक गोगुंदा में हुआ था। राणा प्रताप के पिता उदयसिंह ने अकबर से भयभीत होकर मेवाड़ त्याग कर अरावली पर्वत पर डेरा डाला और उदयपुर को अपनी नई राजधानी बनाया था। हालांकि तब मेवाड़ भी उनके अधीन ही था। महाराणा उदयसिंह ने अपनी मृत्यु के समय अपने छोटे पुत्र को गद्दी सौंप दी थी जोकि नियमों के विरुद्ध था। उदयसिंह की मृत्यु के बाद राजपूत सरदारों ने मिलकर 1628 फाल्गुन शुक्ल 15 अर्थात 1 मार्च 1576 को महाराणा प्रताप को मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया।

उनके राज्य की राजधानी उदयपुर थी। राज्य सीमा मेवाड़ थी। 1568 से 1597 ईस्वी तक उन्होंने शासन किया। उदयपुर पर यवन, तुर्क आसानी से आक्रमण कर सकते हैं, ऐसा विचार कर तथा सामन्तों की सलाह से प्रताप ने उदयपुर छोड़कर कुम्भलगढ़ और गोगुंदा के पहाड़ी इलाके को अपना केन्द्र बनाया।

कुल देवता : 

महाराणा प्रताप उदयपुर, मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे। उनके कुल देवता एकलिंग महादेव हैं। मेवाड़ के राणाओं के आराध्यदेव एकलिंग महादेव का मेवाड़ के इतिहास में बहुत महत्व है। एकलिंग  महादेव का मंदिर उदयपुर में स्थित है। मेवाड़ के संस्थापक बप्पा रावल ने 8वीं शताब्‍दी में इस मंदिर का निर्माण करवाया और एकलिंग की मूर्ति की प्रतिष्ठापना की थी।

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क्या होता है ब्लैक बॉक्स? What is Black Box? | in Hindi |

क्या होता है ब्लैक बॉक्स? What is Black Box? | in Hindi |

किसी भी हवाई दुर्घटना के बाद जांचकर्ता सबसे पहले ब्लैक बॉक्स तलाशने की कोशिश करते हैं। इसमें विमान के अंदर की बहुत अहम जानकारियां संरक्षित रहती हैं। इसे विमान के पिछले हिस्से में लगाया जाता है। 

इसके पीछे मुख्य वजह यह भी है कि किसी दुर्घटना की स्थिति में विमान के पिछले हिस्से को सबसे कम नुकसान की आशंका रहती है। ब्लैक बॉक्स की खासियत क्या-क्या हैं आइये जानते हैं-

नारंगी होता है ब्लैक बॉक्स

अपने नाम के उलट ब्लैक बॉक्स का रंग नारंगी होता है। यह चमकीला रंग इसे आसानी से खोजने लायक बनाता है। इस पर लगा पेंट भी आग और पानी से लगभग अप्रभावित रहता है।


क्या होता है ब्लैक बॉक्स? What is Black Box? | in Hindi |


चार हिस्सों में होता है निर्माण

  • ब्लैक बाक्स के चार हिस्से होते हैं। पहला है इलेक्ट्रानिक सर्किट बोर्ड। इसे मेमोरी बोर्ड भी कहा जाता है। इसे आडियो और कई तरह के डाटा रिकार्ड करने के लिए तैयार किया जाता है।
  • मेमोरी बोर्ड को एल्युमीनियम के डिब्बे में बंद कर दिया जाता है। यह इंसुलेशन इसे 1000 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी सुरक्षित रखता है।
  • इंसुलेशन के बाद इसे टाइटेनियम या स्टेनलेस स्टील के मजबूत बक्से में बंद कर दिया जाता है। यह बाहरी मजबूत परत अंदर के मेमोरी बोर्ड का किसी भी बाहरी चोट, आग और पानी से बचाती है।

ब्लैक बॉक्स की खूबियां

  1. समुद्र की गहराइयों से भी महीनेभर तक इलेक्ट्रानिक सिग्नल भेजने में सक्षम
  2. समुद्र के खाने पानी से भी ब्लैक बॉक्स को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है।
  3. किसी विमान हादसे की स्थिति में लगने वाले अधिकतम संभावित आघात को यह आसानी से सह सकता है।
  4. 1000 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान झेलने में सक्षम है ।

ब्लैक बॉक्स इतना जरुरी क्यों है?

ब्लैक बॉक्स मेें फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर (एफडीआर) और कॉकपिट वायस रिकार्डर (सीवीआर) होते हैं। ये दोनों रिकार्डर एक ही बाक्स में या अलग-अलग बाक्स में रखे हो सकते हैं। फ्लाइट डाटा रिकार्डर विमान की गति, ऊंचाई, हवा की गति, विमान के ऊपर जाने की गति, ईंधन के फ्लो समेत करीब 80 गतिविधियां प्रति सेकेण्ड रिकॉर्ड करता है। इसमें 24 घंटे से ज्यादा की रिकॉर्डिंग रहती है। सीवीआर में काकपिट की आवाज रिकॉर्ड होती है। यह पायलटों की आपसी बातचीत, उनकी एयर ट्रैफिक कंट्रोल (एटीसी) से हुई बातचीत को रिकार्ड करता है। स्विच और इंजन की आवाज भी इसमें रिकार्ड होती है। इनके विश्लेषण से दुर्घटना के कारण को जानने में मदद मिलती है।

ऐसे काम करता है ब्लैक बॉक्स

ब्लैक बॉक्स वास्तव में काले नहीं बल्कि उच्च दृश्यता वाले नारंगी रंग के होते हैं। इसका उद्देश्य भविष्य में होने वाली दुर्घटनाओं के विश्लेषण और रोकथाम में मदद करने के लिए कॉकपिट की बातचीत के डाटा को संरक्षित करना है।

साढ़े चार किलो का होता है

  1. इसका वनज लगभग 4.5 किलो का होता है। इसमें दो रिकॉर्डर होते हैं।
  2. पहला कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (सीवीआर),  जिसमें पायलट और कॉकपिट की आवाज रिकॉर्ड होती है।
  3. दूसरा फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (एफडीआर), जो विमान में बैठे बाकी लोगों की आवाज रिकॉर्ड की जाती है।
  4. कमर्शियल हो या लड़ाकू, ब्लैक बॉक्स यानी फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर हर तरह के विमान में लगा होता है।

ऐसे डाटा को निकालते हैं

किसी दुर्घटनाग्रस्त विमान का ब्लैक बॉक्स मिलने के बाद तकनीकी विशेषज्ञ सबसे पहले सुरक्षात्मक मटेरियल को हटाकर बेहद सावधानी से कनेक्शन क्लीन करते हैं, ताकि गलती से कोई भी जरुरी डाटा न मिटे।



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अहा! यह घड़ा कितना भाग्यशाली है - कष्टो का मूल्य Kaston Ka Mulya - Kahaani

 अहा! यह घड़ा कितना भाग्यशाली है - कष्टो का मूल्य

Kaston Ka Mulya - Kahaani

किसी स्थान पर संतों की एक सभा चल रही थी, किसी ने एक घड़े में गंगाजल भरकर वहां रखवा दिया ताकि संतजन को जब प्यास लगे तो गंगाजल पी सकें।

संतों की उस सभा के बाहर एक व्यक्ति खड़ा था, उसने गंगाजल से भरे घड़े को देखा तो उसे तरह-तरह के विचार आने लगे। वह सोचने लगा:- "अहा, यह घड़ा कितना भाग्यशाली है, एक तो इसमें किसी तालाब पोखर का नहीं बल्कि गंगाजल भरा गया और दूसरे यह अब सन्तों के काम आयेगा। संतों का स्पर्श मिलेगा, उनकी सेवा का अवसर मिलेगा, ऐसी किस्मत किसी-किसी की ही होती है।

अहा! यह घड़ा कितना भाग्यशाली है - कष्टो का मूल्य Kaston Ka Mulya - Kahaani


घड़े ने उसके मन के भाव पढ़ लिए और घड़ा बोल पड़ा:- बंधु मैं तो मिट्टी के रूप में शून्य पड़ा था, किसी काम का नहीं था, कभी नहीं लगता था कि भगवान् ने हमारे साथ न्याय किया है। फिर एक दिन एक कुम्हार आया, उसने फावड़ा मार-मारकर हमको खोदा और गधे पर लादकर अपने घर ले गया।


वहां ले जाकर हमको उसने रौंदा, फिर पानी डालकर गूंथा, चाक पर चढ़ाकर तेजी से घुमाया, फिर गला काटा, फिर थापी मार-मारकर बराबर किया। बात यहीं नहीं रूकी, उसके बाद आंवे के अंदर आग में झोंक दिया जलने को। इतने कष्ट सहकर बाहर निकला तो गधे पर लादकर उसने मुझे बाजार में भेज दिया, वहां भी लोग ठोक-ठोककर देख रहे थे कि ठीक है कि नहीं?

ठोकने-पीटने के बाद मेरी कीमत लगायी भी तो क्या- बस 20 से 30 रुपये, मैं तो पल-पल यही सोचता रहा कि:- "हे ईश्वर सारे अन्याय मेरे ही साथ करना था, रोज एक नया कष्ट एक नई पीड़ा देते हो, मेरे साथ बस अन्याय ही अन्याय होना लिखा है।" भगवान ने कृपा करने की भी योजना बनाई है यह बात थोड़े ही मालूम पड़ती थी।

किसी सज्जन ने मुझे खरीद लिया और जब मुझमें गंगाजल भरकर सन्तों की सभा में भेज दिया तब मुझे आभास हुआ कि कुम्हार का वह फावड़ा चलाना भी भगवान् की कृपा थी। उसका वह गूंथना भी भगवान् की कृपा थी, आग में जलाना भी भगवान् की कृपा थी और बाजार में लोगों के द्वारा ठोके जाना भी भगवान् की कृपा ही थी।

अब मालूम पड़ा कि सब भगवान् की कृपा ही कृपा थी।

परिस्थितियां हमें तोड़ देती हैं, विचलित कर देती हैं- इतनी विचलित की भगवान के अस्तित्व पर भी प्रश्न उठाने लगते हैं। क्यों हम सबमें इतनी शक्ति नहीं होती ईश्वर की लीला समझने की, भविष्य में क्या होने वाला है उसे देखने की? इसी नादानी में हम ईश्वर द्वारा कृपा करने से पूर्व की जा रही तैयारी को समझ नहीं पाते। बस कोसना शुरू कर देते हैं कि सारे पूजा-पाठ, सारे जतन कर रहे हैं फिर भी ईश्वर हैं कि प्रसन्न होने और अपनी कृपा बरसाने का नाम ही नहीं ले रहे। पर हृदय से और शांत मन से सोचने का प्रयास कीजिए, क्या सचमुच ऐसा है या फिर हम ईश्वर के विधान को समझ ही नहीं पा रहे?

आप अपनी गाड़ी किसी ऐसे व्यक्ति को चलाने को नहीं देते जिसे अच्छे से ड्राइविंग न आती हो तो फिर ईश्वर अपनी कृपा उस व्यक्ति को कैसे सौंप सकते हैं जो अभी मन से पूरा पक्का न हुआ हो। कोई साधारण प्रसाद थोड़े ही है ये, मन से संतत्व का भाव लाना होगा।

ईश्वर द्वारा ली जा रही परीक्षा की घड़ी में भी हम सत्य और न्याय के पथ से विचलित नहीं होते तो ईश्वर की अनुकंपा होती जरूर है, किसी के साथ देर तो किसी के साथ सवेर। यह सब पूर्वजन्मों के कर्मों से भी तय होता है कि ईश्वर की कृपादृष्टि में समय कितना लगना है।

घड़े की तरह परीक्षा की अवधि में जो सत्यपथ पर टिका रहता है वह अपना जीवन सफल कर लेता है।

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Thursday, December 9, 2021

कालनेमि - एक ऐसा दैत्य जिसने कलियुग तक भगवान विष्णु का पीछा नहीं छोड़ा! (Kaalnemi - Ek aisa Daitya Jisne Kalyug Tak Bhagwan Ka Peecha Nahi Chhoda..Pauranik Gaatha)

कालनेमि - एक ऐसा दैत्य जिसने कलियुग तक भगवान विष्णु का पीछा नहीं छोड़ा!

(Kaalnemi - Ek aisa Daitya Jisne Kalyug Tak Bhagwan Ka Peecha Nahi Chhoda..Pauranik Gaatha)


सतयुग में दो महाशक्तिशाली दैत्य हुए - हिरण्यकशिपु एवं हिरण्याक्ष। ये इतने शक्तिशाली थे कि इनका वध करने को स्वयं भगवान विष्णु को अवतार लेना पड़ा। हिरण्याक्ष ने अपनी शक्ति से पृथ्वी को सागर में डुबो दिया। तब नारायण ने वाराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का वध किया। उसके दो पुत्र थे - अंधक एवं कालनेमि जो उसके ही समान शक्तिशली थे। 

कालनेमि - एक ऐसा दैत्य जिसने कलियुग तक भगवान विष्णु का पीछा नहीं छोड़ा! (Kaalnemi - Ek aisa Daitya Jisne Kalyug Tak Bhagwan Ka Peecha Nahi Chhoda..Pauranik Gaatha)


जब तक उनके चाचा हिरण्यकशिपु जीवित रहे, उन्होंने उनके संरक्षण में जीवन बिताया किन्तु जब नारायण ने हिरण्यकशिपु को नृसिंह अवतार लेकर मारा तब दोनों भाई ने प्रतिशोध लेने की ठानी। अंधक अपनी महान शक्ति के मद में आकर देवी पार्वती से धृष्टता कर बैठा और महारुद्र के हाथों मारा गया। तब कालनेमि ने महादेव से प्रतिशोध लेने हेतु अपनी पुत्री वृंदा, जिसे ये वरदान प्राप्त था कि उसके होते उसके पति की मृत्यु नहीं हो सकती, उसका विवाह जालंधर नमक दैत्य से कर दिया जो महादेव का घोर शत्रु था।

हालाँकि वृंदा का सतीत्व भी जालंधर को बचा नहीं सका और वो नारायण के छल के कारण भगवान शिव के हाथों मारा गया। जब कालनेमि को विष्णु के छल और अपनी पुत्री और दामाद के मृत्यु का समाचार मिला तो उसने नारायण से प्रतिशोध लेने की प्रतिज्ञा की।

परमपिता ब्रह्मा के मानस पुत्र मरीचि, जो प्रजापति होने के साथ-साथ सप्तर्षिओं में भी एक थे, उनके छः पुत्र हुए। एक दिन महर्षि मारीचि अपने पुत्रों के साथ अपने पिता ब्रह्मदेव से मिलने गए। वहाँ देवी सरस्वती भी उपस्थित थी। जब वे वहाँ पहुँचे तो उनके सभी पुत्रों ने अपने पितामह ब्रह्मा से परिहास में ही कहा कि - "हे पितामह! सुना है कि आपने अपनी ही पुत्री देवी सरस्वती से विवाह कर लिया था। ये कैसे संभव है?" ऐसा कह कर सारे हँसने लगे। 


तब ब्रह्माजी ने उन सभी को श्राप दिया कि अगले जन्म में वो एक दैत्य के रूप में जन्मेंगे। उनके क्षमा माँगने पर उन्होंने कहा कि उसके भी अगले जन्म में उन्हें नारायण के बड़े भाई के रूप में जन्म लेने का सौभाग्य मिलेगा और उन्हें अधिक समय तक पृथ्वीलोक पर ना रहना पड़े इसी कारण जन्मते ही उन्हें मुक्ति मिल जाएगी।

 उधर कालनेमि अपने पिता हिरण्याक्ष के वध का प्रतिशोध लेने के लिए ब्रह्माजी की तपस्या कर रहा था। जब ब्रह्माजी प्रसन्न हुए तो उसने वरदान माँगा कि उसे छः ऐसे पुत्र मिलें जो अजेय हों। तब ब्रह्मदेव के वरदान स्वरूप महर्षि मरीचि के श्रापग्रसित छः पुत्र अगले जन्म में कालनेमि के छः पुत्रों के रूप में जन्मे। उनके अतिरिक्त उसकी एक और कन्या थी वृंदा, जिसे तुलसी के नाम से भी जानते हैं।


 जब कालनेमि के छः पुत्रों ने उत्पात मचाना शुरू किया तो कालनेमि के चाचा हिरण्यकशिपु ने उन्हें पाताल जाने की आज्ञा दे दी। कालनेमि के रोकने पर भी उन सभी ने हिरण्यकशिपु की आज्ञा मानी और पाताल जाकर बस गए। इससे कालनेमि स्वयं अपने पुत्रों का शत्रु हो गया और निश्चय किया कि वो अगले जन्म में अपने ही पुत्रों का अपने हाथों से वध करेगा। 

इसके बाद अपने चाचा हिरण्यकशिपु की मृत्यु के पश्चात, अपने भाई प्रह्लाद के लाख समझाने के बाद भी कालनेमि ने भगवान विष्णु पर आक्रमण कर दिया। उस युद्ध में उसने देवी दुर्गा की भांति सिंह को अपना वाहन बनाया। दोनों में घनघोर युद्ध हुआ और कहा जाता है कि उस युद्ध में कालनेमि ने भगवान विष्णु पर ब्रह्मास्त्र से प्रहार किया किन्तु उससे नारायण को कोई हानि नहीं हुई। फिर कालनेमि ने नारायण पर एक अमोघ त्रिशूल से प्रहार किया किन्तु नारायण ने उसे बीच में ही पकड़ कर नष्ट कर दया। 


फिर उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से कालनेमि का अंत कर दिया। मरते हुए उसने प्रतिज्ञा की कि वो फिर जन्म लेगा और नारायण से प्रतिशोध लेगा। अपने भाई की मृत्यु पर प्रह्लाद अत्यंत दुखी हो गया। अंततः प्रह्लाद की प्राथना पर भगवान विष्णु ने उसे आश्वासन दिलाया कि अगले जन्म में भी वही उसका वध करके उसे जीवन मरण के चक्र से मुक्त करेंगे। 

मथुरा के राजा उग्रसेन अपनी पत्नी पद्मावती के साथ सुख से राज कर रहे थे। विवाह के तुरंत बाद पद्मावती अपने पिता सत्यकेतु के घर गयी। एक बार कुबेर का एक संदेशवाहक गन्धर्व द्रुमिला (गोभिला) सत्यकेतु से मिलने आया। जब उसने पद्मावती को देखा तो उसके सौंदर्य पर मोहित हो गया। उसने छल से उग्रसेन का वेश बनाया और पद्मावती से मिलने आया। पद्मावती उसे अपना पति समझ कर उसके साथ उसी प्रकार का व्यहवार करने लगी।


 थोड़े दिनों के पश्चात उसके पुत्र के रूप में कालनेमि ने नारायण से प्रतिशोध लेने के लिए जन्म लिया। उसका नाम कंस रखा गया। उसके जन्म के पश्चात देवर्षि नारद ने पद्मावती को गन्धर्व के छल के बारे में बता दिया जिससे उसे अपने पुत्र से घृणा हो गयी। उसने अपने पति उग्रसेन को तो कुछ नहीं बतया किन्तु वो मन ही मन उसकी मृत्यु की कामना करने लगी। 

आगे चल कर कंस ने अपने पिता को कैद कर लिया और ये जानकर कि देवकी उस संतान को जन्म देगी जो उसके वध का कारण बनेगा, उसे भी कारावास में डाल दिया। बाद में उसे पता चला कि देवकी की आठवीं संतान के रूप में भगवान विष्णु जन्म लेंगे तो उसने उसे मारकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने की ठानी। देवकी के पहले छः पुत्रों के रूप में कालनेमि के छः पुत्र जन्मे जिन्हे मारकर कंस रुपी कालनेमि ने अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण की।


 देवकी की सातवीं संतान संकर्षित हो वासुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में चली गयी जिससे बलराम का जन्म हुआ। देवकी के गर्भ से उनकी जगह महामाया ने जन्म लिया जिसने बताया कि देवकी की आठवीं संतान का भी जन्म हो गया है। अपना प्रतिशोध लेने के लिए कंसरुपी कालनेमि ने कृष्ण के कारण गोकुल के सभी बच्चों के वध का आदेश दिया। सैकड़ों बच्चे मारे गए किन्तु कृष्ण को कुछ नहीं हुआ। १६ वर्ष की आयु में कृष्ण ने अपने भाई बलराम के साथ कंस का वध कर संसार को उसके अत्याचार से मुक्त किया।


       इस प्रकार कालनेमि ने सतयुग से द्वापर तक नारायण का पीछा किया किन्तु प्रभु को कौन मार सका है? हर बार उसे अपने प्राण गवाने पड़े। कहते है कि कालनेमि ही द्वापर के अंत समय प्रत्येक रात्रि के रूप में उसे कलियुग के और निकट ले जाता है। यहाँ तक कि कलियुग को भी कालनेमि का अवतार माना जाता है। ये भी मान्यता है कि अपना प्रतिशोध लेने के लिए ही कालनेमि कलियुग के रूप में जन्मा ताकि इस युग में भी वो नारायण के कल्कि अवतार से प्रतिशोध ले सके। हालाँकि अगर ये सत्य है तो हम जानते हैं कि इसका परिणाम क्या होगा।


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गंगईकोंडा चोलपुरम: पत्थरों में उकेरा गया इतिहास (Gangaikonda Cholpuram)

 गंगईकोंडा चोलपुरम: पत्थरों में उकेरा गया इतिहास (Gangaikonda Cholpuram)


एक 1000 वर्षों में निर्मित, 180 फीट लंबा गंगईकोंडाचोलेश्वरम मंदिर शानदार है - सुनहरे-भूरे रंग के पत्थर से बना जटिल नक्काशीदार गोपुरम, एक स्पष्ट नीले आकाश के सामने खड़ा है और सुंदर चोल मूर्तियां आपको एक और समय में ले जाती हैं !

गंगईकोंडा चोलपुरम: पत्थरों में उकेरा गया इतिहास (Gangaikonda Cholpuram)

यहाँ इस पवित्र विरासत स्थल के बारे में दिलचस्प तथ्य है।


जीभ-घुमावदार नाम का अर्थ है 'चोल का शहर जिसने गंगा पर विजय प्राप्त की' और राजेंद्र चोल के उत्तरी नदी के अभियान की याद दिलाता है। कहा जाता है कि राजा ने 5 किमी लंबा भरने के लिए यहां हजारों लीटर गंगा जल मंगाया था।

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थिल्लई नटराज मंदिर, चिदंबरम के राजसी गोपुर का एक आकर्षक दृश्य! || Thillai Natraj Temple

 थिल्लई नटराज मंदिर, चिदंबरम के राजसी गोपुर का एक आकर्षक दृश्य! || Thillai Natraj Temple


शैवियों के लिए सभी मंदिरों (कोविल) में सबसे प्रमुख के रूप में गिना जाता है, थिलाई नटराज मंदिर या चिदंबरम नटराज मंदिर भगवान शिव को समर्पित है, जिन्हें यहां ब्रह्मांडीय नर्तक भगवान नटराज के रूप में पूजा जाता है।

थिल्लई नटराज मंदिर, चिदंबरम के राजसी गोपुर का एक आकर्षक दृश्य! || Thillai Natraj Temple


पांच प्रसिद्ध पंच बूथों में से एक होने के नाते, प्रत्येक पवित्र शिव मंदिरों के पांच शास्त्रीय तत्वों में से एक का प्रतिनिधित्व करता है; चिदंबरम नटराज मंदिर आकाश (आकाश) का प्रतिनिधित्व करता है। 

यह तमिलनाडु में उल्लेखनीय रूप से प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों में से एक है जिसने दो सहस्राब्दियों से पूजा, वास्तुकला, मूर्तिकला और प्रदर्शन कला को प्रभावित किया है। चिदंबरम नटराज मंदिर की मूर्तियों ने भरत नाट्यम की मुद्राओं को प्रेरित किया।

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Kailash Temple, Ellora : Amazing Facts In Hindi || कैलाश मंदिर, एलोरा : अद्भुत तथ्य हिंदी में

 Kailash Temple, Ellora : Amazing Facts In Hindi || कैलाश मंदिर, एलोरा : अद्भुत तथ्य हिंदी में


1. एलोरा का यह कैलाश मन्दिर (Kailash Temple) महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में प्रसिद्ध एलोरा की गुफाओं में स्थित है और इस मन्दिर में विशाल और भव्‍य नक्काशी देखने को मिलती है।

2. यह  कैलाश मन्दिर एलोरा की सबसे बड़ी 16वीं गुफा में अपनी अनूठी वास्सेतुकला से  इस गुफा की शोभा बढ़ा रहा है।

3.  इस शिव मंदिर को तैयार होने में 150 साल का समय लगा था। इस मंदिर की ऊंचाई 90 फीट है और लम्बाई 276 फीट, चौड़ाई 54 फीट है।

4. विशेषज्ञों का मानना है कि इस मंदिर के निर्माण में  1 – 2 साल नहीं बल्कि दस पीढियां लगी थी और मत यह भी है की इस मंदिर के निर्माण कार्य  को लगातार 7000 के लगभग मज़दूर कर रहे थे।

Kailash Temple, Ellora : Amazing Facts In Hindi || कैलाश मंदिर, एलोरा : अद्भुत तथ्य हिंदी में


5. एलोरा का यह कैलाश मन्दिर (Kailash Temple) आम मंदिर की तरह पत्थरों से जोड़कर नहीं बल्कि केवल एक अकेले पहाड़ को काटकर बनाया गया है और यह मंदिर दुनिया भर में एक ही पत्थर की शिला से बनी हुई सबसे बड़ी मूर्ति के लिए प्रसिद्ध भी है।

6. एलोरा के इस  कैलाश मन्दिर की यह संरचना भगवान शिव के निवास स्थान कैलाश पर्वत जैसी दिखाई देती है |

7. एलोरा के इस  कैलाश मन्दिर में एक खुला मंडप है जिसमें शिव के वाहन नंदी जी विराजमान है और उसके दोनों ओर विशालकाय हाथी और स्तंभ बने हैं और आंगन के तीनों ओर कोठरियां हैं।

8. हालाँकि यह भगवान शिव का मंदिर है पर यहाँ पूजा अर्चना का कोई प्रावधान नहीं है और न ही इसमें कोई पुजारी है। हालाँकि लोग धार्मिक आस्था से यहाँ जाते हैं पर पूजा का प्रावधान देखने को नहीं मिलता।

9. एलोरा के इस  कैलाश मन्दिर के इतिहास और निर्माण के समय से सम्बन्धित  जानकारी के बारे में आजतक कोई भी इतिहासकार या विशेषज्ञ सही अनुमान नही लगा पाया है |

10. एलोरा का यह कैलाश मन्दिर ‘विरुपाक्ष मंदिर’ से प्रेरित होकर राष्ट्रकूट वंश के शासन के दौरान बनाया गया था।

11. एलोरा के इस  कैलाश मन्दिर में रिसर्च के दौरान पुरातत्वशास्त्र (Archaeology) और भूविज्ञान विभाग (Department Of Geology) की टीम को जमीन के नीचे बने हुवे एक पुराने शहर के अवशेष भी मिले है | यहाँ पर आम लोगो का प्रवेश वर्जित है|

12. एलोरा के  कैलाश मन्दिर के निर्माण में ऐसा कई एतिहासिक सबूतों से पता चलता है कि इस प्राचीन मंदिर के निर्माण प्रक्रिया में बौद्ध और जैन सहित कई धर्मों और संस्कृति का योगदान रहा था। बाद में हिंदू राजाओं ने भी इस कैलाश मंदिर के निर्माण में अपना बड़ा योगदान दिया था ।

13. एलोरा के इस  कैलाश मन्दिर को नष्ट करने के लिए वर्ष 1682 में मुगल शासक औरंगजेब ने हजार सैनिकों के एक दल को भेजा था जो लगातार 3 वर्षो तक की इस मंदिर को पूरी तरह से नष्ट करने की कोशिश करते रहे पर सफल ना हो सके |

14. एलोरा के कैलाश मन्दिर में दुनिया की सबसे बड़ी कैंटिलीवर रॉक छत है जो हजारों वर्ष पूर्व निर्माण हुए किसी भी मंदिर के लिए एक असंभव उपलब्धि है।

15. पुरातत्वविदों (Archaeologists) का मानना है कि उस समय एलोरा के इस  कैलाश मन्दिर के निर्माण के लिए मूर्तिकारों ने चार टन से अधिक चट्टान को बाहर निकाला होंगा जो आज के समय में उपलब्ध सबसे बड़ी 10 टन वाली जेसीबी मशीनों का उपयोग करके भी असंभव है।

16. एलोरा के इस  कैलाश मन्दिर में जिस तरह से मंदिरों की दीवारों और स्तंभों के बीच ध्वनि चलती है और कंपन होती है, वह इस बात का संकेत है कि इस स्थान पर भारतीय ऋषियों का दिव्य आशीर्वाद है।

17. एलोरा के इस  कैलाश मन्दिर के निर्माण के बारे में कुछ लोग ऐसा भी मानते है कि इस मंदिर का निर्माण बाहरी दुनिया के लोगो ने किया होंगा क्योंकि हज़ारो वर्ष पहले बिना तकनीक इतने बड़े ढाँचे का निर्माण करना असंभव रहा होंगा |

18. एलोरा के इस  कैलाश मन्दिर की शीर्ष से लेकर नीचे तक उस समय जो उत्तम नक्काशी की गई होंगी वो आज के समय में केवल छेनी और हथौड़ों का उपयोग करके भी असंभव है |

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1,500+ वर्ष पुराना 'नालंदा बौद्ध विश्वविद्यालय' (1500+ Years Old Nalanda University)

 1,500+ वर्ष पुराना 'नालंदा बौद्ध विश्वविद्यालय' (1500+ Years Old Nalanda University)


1,500+ वर्ष पुराना 'नालंदा बौद्ध विश्वविद्यालय' प्राचीन मगध (आधुनिक बिहार), भारत में एक प्रसिद्ध बौद्ध मठवासी विश्वविद्यालय था।

नालंदा की स्थापना गुप्त साम्राज्य के युग के दौरान हुई थी, और इसे कई भारतीय संरक्षकों - बौद्ध और गैर-बौद्ध दोनों का समर्थन प्राप्त था।

लगभग 750 वर्षों में, इसके संकाय में महायान बौद्ध धर्म के कुछ सबसे सम्मानित विद्वान शामिल थे। नालंदा महाविहार ने छह प्रमुख बौद्ध स्कूलों और दर्शनशास्त्र जैसे योगकारा और सर्वस्तिवाद के साथ-साथ व्याकरण, चिकित्सा, तर्क और गणित जैसे विषयों को पढ़ाया।

1,500+ वर्ष पुराना 'नालंदा बौद्ध विश्वविद्यालय' 1500+ Old Nalanda University


इसके पतन के बाद, नालंदा को काफी हद तक भुला दिया गया जब तक कि फ्रांसिस बुकानन-हैमिल्टन ने 1811-1812 में साइट का सर्वेक्षण नहीं किया, जब आसपास के स्थानीय लोगों ने क्षेत्र में खंडहरों के एक विशाल परिसर की ओर उनका ध्यान आकर्षित किया। हालाँकि, उन्होंने पृथ्वी के टीले और मलबे को प्रसिद्ध नालंदा से नहीं जोड़ा। उस कड़ी की स्थापना मेजर मार्खम कित्तो ने 1847 में की थी। अलेक्जेंडर कनिंघम और नवगठित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 1861-1862 में एक आधिकारिक सर्वेक्षण किया।

एएसआई द्वारा खंडहरों की व्यवस्थित खुदाई 1915 तक शुरू नहीं हुई और 1937 में समाप्त हुई। खुदाई और बहाली का दूसरा दौर 1974 और 1982 के बीच हुआ।

नालंदा के अवशेष आज लगभग 488 मीटर (1,600 फीट) उत्तर से दक्षिण और लगभग 244 मीटर (800 फीट) पूर्व से पश्चिम तक फैले हुए हैं। उत्खनन से ग्यारह मठों और छह प्रमुख ईंट विहारों का पता चला है जो एक क्रमबद्ध लेआउट में व्यवस्थित हैं। एक 30 मीटर (100 फीट) चौड़ा मार्ग उत्तर से दक्षिण की ओर जाता है जिसके पश्चिम में मंदिर और पूर्व में मठ हैं।

अधिकांश संरचनाएं पुराने के खंडहरों के ऊपर नई इमारतों के निर्माण के साथ निर्माण की कई अवधियों के प्रमाण दिखाती हैं। कई इमारतें कम से कम एक अवसर पर आग से क्षति के संकेत भी प्रदर्शित करती हैं।

फैक्सियन, जिसे फाहसीन भी कहा जाता है, एक चीनी बौद्ध तीर्थयात्री भिक्षु था जो बौद्ध ग्रंथों को प्राप्त करने के लिए भारत आया था और एक यात्रा वृत्तांत छोड़ गया था। उन्होंने 5वीं शताब्दी की शुरुआत में भारत में 10 साल बिताए, अन्य चीनी और कोरियाई बौद्धों को सदियों से भारत आने के लिए प्रेरित किया, और नालंदा क्षेत्र सहित प्रमुख बौद्ध तीर्थ स्थलों का दौरा किया। 

उन्होंने भारत भर में कई बौद्ध मठों और स्मारकों का उल्लेख किया है। हालाँकि, उन्होंने नालंदा में किसी मठ या विश्वविद्यालय का कोई उल्लेख नहीं किया, भले ही वे संस्कृत ग्रंथों की तलाश कर रहे थे और उनमें से बड़ी संख्या में भारत के अन्य हिस्सों से वापस चीन ले गए। नालंदा में पूर्व-400 सीई बौद्ध स्मारकों की किसी भी पुरातात्विक खोजों की कमी के साथ संयुक्त।

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राम की वनवास यात्रा के साक्ष्य बने स्थानों की....कहानी (Ram ki Vanvaas Yatra Ke Sakshya Bane Sthaan)

राम की वनवास यात्रा के साक्ष्य बने स्थानों की....कहानी (Ram ki Vanvaas Yatra Ke Sakshya Bane Sthaan)

भारत का शायद ही कोई निवासी होगा जो भगवान राम के जीवन से अपरिचित हो। दरअसल मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का जीवन स्वयं में इतना महान रहा है कि अगर कभी आदर्श व्यक्तित्व का उदाहरण देना पड़े तो श्रीराम से ऊपर किसी का नाम नहीं आता। वहीं यदि बात यदि उनके वनवास के दिनों की घटनाओं की करें तो वहां से भी हम बहुत कुछ जान-सीख सकते है। आज से भारतीय रेलवे उन सभी स्थानों को एक रेलमार्ग में जोड़कर “श्री रामायण एक्सप्रेस” नामक रेलगाड़ी की शुरुआत कर रही है। ऐसे में रेलयात्री ने सोचा कि क्यों न सभी रेलयात्रियों को अपने ब्लॉग के ज़रिये उन सभी पवित्र स्थानों के आत्मिक दर्शन करवा दिए जाएं। जहां जहां श्रीराम ने माता सीता एवं अपने अनुज लक्ष्मण के साथ वनवास का समय बिताया था  आईए जाने भारत में स्थित उन स्थानों एवं घटनाओं के बारे में जहां श्रीराम के पावन चरण पड़े थे।

राम की वनवास यात्रा के साक्ष्य बने स्थानों की....कहानी


केवट प्रसंग-

वाल्मिकी रामायण के अनुसार अयोध्या का राजमहल त्यागने के बाद भगवान राम माता सीता, अनुज लक्ष्मण संग सर्वप्रथम अयोध्या से कुछ दूर स्थित मनसा नदी के समीप पहुंचे। वहां से गोमती नदी पार कर वे इलाहाबाद के समीप वेश्रंगवेपुर गये जो राजा गुह का क्षेत्र था। जहां उनकी भेंट केवट से हुई जिसको उन्होंने गंगा पार करवाने को कहा था। वर्तमान में वेश्रंगवेपुर सिगरौरी के नाम से जाना जाता है जो कि इलाहाबाद के समीप स्थित है। वहीं गंगा पार कर भगवान ने कुरई नामक स्थान में कुछ दिन विश्राम किया था। यहां एक छोटा मंदिर है जो उनके विश्रामस्थल के रूप में जाना जाता है।

चित्रकुट का घाट-

कुरई से आगे भगवान राम ‘प्रयाग’ ( इलाहाबाद )। प्रयाग स्थित बहुत से स्मारक उनके वहां व्यतीत किए दिनों के साक्ष्य है। इनमें वाल्मीकि आश्रम, माडंव्य आश्रम, भरतकूप आदि प्रमुख हैं  विद्वानों के अनुसार यही वह स्थान है जहां उनके अनुज भरत उन्हें मनाने के लिए आए थे और श्रीराम के मना करने के बाद उनकी चरण पादुकाओं को राजसिंहासन पर रखकर अयोध्या नगरी का भार संभाला था। क्योंकि तब दशरथ भी स्वर्ग सिधार चुके थे।

अत्रि ऋषि का आश्रम-

वहां से प्रस्थान कर भगवान सतना मध्यप्रदेश पहुंचे। वहां उन्होंने अत्रि ऋषि के आश्रम में कुछ समय व्यतीत किया। अत्रि ऋषि वहां अपनी पत्नी, माता अनुसूइया के साथ निवास करते थे। अत्रि ऋषि, माता अनुसूइया एवं उनके भक्त सभी वन के राक्षसों से काफी भयभीत रहते थे। श्रीराम ने उनके भय को दूर करने के लिए सभी राक्षसों का वध कर दिया।

दंडकारणय-

अत्रि ऋषि से आज्ञा लेकर भगवान ने आगे पड़ने वाले दंडकारयण ‘छतीसगढ़‘ के वनों में अपनी कुटिया बनाई। यहां के जंगल काफी घने हैं  और आज भी यहां भगवान राम के निवास के चिन्ह मिल जाते हैं। मान्यता ये भी है कि इस वन का एक विशाल हिस्सा  भगवान राम के नाना एवं कुछ पर रावण के मित्र राक्षस वाणसुर के राज्य में पड़ता था। यहां प्रभु ने लम्बा समय बिताया एवं नजदीक के कई क्षेत्रों का भी भ्रमण भी किया। पन्ना, रायपुर, बस्तर, जगदलपुर में बने कई स्मारक स्थल इसके प्रतीक हैं। वहीं शहडोल, अमरकंटक के समीप स्थित सीताकुंड भी बहुत प्रसिद्ध है। यहीं पास में सीता बेंगरा एवं लक्ष्मण बेंगरा नामक दो गुफाएं भी हैं।

पंचवटी में राम-

दंडकारणय में कुछ वर्ष व्यतीत करने के बाद प्रभु गोदावरी नदी, ‘नासिक के समीप’ स्थित पंचवटी आ गए। कहते हैं कि यहीं लक्ष्मण ने रावण की बहन शूर्पनखा की नाक काटी थी। इसके बाद यह स्थान नासिक के नाम से प्रसिद्ध हो गया। ‘संस्कृत में नाक को नासिक कहते हैं ।‘ जबकि पंचवटी का नाम गोदावरी के तट पर लगाए गए पांच वृक्षों पीपल, बरगद, आवला, बेल तथा अशोक के नाम पर पड़ा। मान्यता है कि ये सभी वृक्ष राम- सीता, लक्ष्मण ने लगाए थे। राम-लक्ष्मण ने यहीं खर-दूषण साथ युद्ध किया था। साथ ही मारीच वध भी इसी क्षेत्र में हुआ था।

सीताहरण का स्थान-

नासिक से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित ताकड़े गांव के बारे में मान्यता है कि इसी स्थान के समीप भगवान की कुटिया थी जहां से रावण ने माता सीता का हरण किया था।  इसके पास ही जटायु एवं रावण के बीच युद्ध भी हुआ था एवं मृत्युपूर्व जटायु ने यहीं राम को सीताहरण के बारे में बताया था। यह स्थान सर्वतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। वहीँ आंध्रप्रदेश के खम्मम के बारें में कई लोगों की मान्यता है कि राम-सीता की कुटिया यहां थी।

शबरी को दर्शन-

जटायु के अंतिम सस्कार के बाद राम-लक्ष्मण सीता की खोज में ऋष्यमूक पर्वत की ओर गए। रास्ते में वे पम्पा नदी के समीप शबरी की कुटिया में पहुंचे। भगवान राम की शबरी से हुई भेंट से भला कौन परिचित नहीं है? पम्पा नदी केरल में है प्रसिद्द सबरीमला मंदिर इसके तट पर बना हुआ है।

हनुमान से भेंट-

घने चंदन के वनों को पार करते हुए जब भगवान ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचे तब वहां उन्हें सीता के आभूषण मिले एवं हनुमान से भेंट हुई। यहीं समीप में उन्होंने बाली का वध किया था यह स्थान कर्णाटक के हम्मी, बैल्लारी क्षेत्र में स्थित है। पहाड़ के नीचे श्रीराम का एक मंदिर है एवं नजदीक स्थित पहाड़ के बारें मान्यता है कि वहां मतंग ऋषि का आश्रम था इसलिए पहाड़ का नाम  मतंग पर्वत है।

सेना का गठन-

हनुमान एवं सुग्रीव से मित्रता के बाद राम ने अपनी सेना का गठन किया एवं किष्किन्धा ‘कर्णाटक’ से प्रस्थान किया। मार्ग में कई वनों, नदियों को पार करते हुए वो रामेश्वरम पहुंचे। यहां उन्होंने युद्ध में विजय के लिए भगवान शिव की पूजा की। रामेश्वरम में तीन दिनों के प्रयास के बाद भगवान ने उस स्थान का पता लगवा लिया जहां से आसानी से लंका जाया जा सकता था। फिर अपनी सेना के वानर नल-नील की सहायता से उस स्थान पर रामसेतु का निर्माण करवाया।

नुवारा एलिया पर्वत श्रृंख्ला-

मान्यताओं के अनुसार हनुमान द्वारा सर्वप्रथम लंका जाने के बाद जिस स्थान का ज्ञान हुआ वो लंका संमुद्र से घिरी नुवारा एलिया पर्वत श्रृंख्ला थी।  रावण की लंका यहीं  पर बसी हुई थी। यहीं रावण के साम्राज्य को समाप्त कर राम ने 72 दिन चले युद्ध के बाद सीता को रावण की लंका से मुक्त कराया था।

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